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मुस्लिम कोटे पर ब्रेक! सरकार ने 5 फीसदी आरक्षण किया रद्द

  • Mar 23
  • 4 min read

जनचेतना/गोंदिया/सचिन बोपच




महाराष्ट्र में महायुति सरकार द्वारा नौकरियों और शिक्षा में मुसलमानों के लिए तय 5 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया है. सामाजिक न्याय विभाग ने सरकारी आदेश जारी करते हुए अपने 2014 के आदेश को रद्द कर दिया. उस आदेश में मुसलमानों को शैक्षणिक संस्थानों के साथ सरकारी व अर्ध-सरकारी नौकरियों में 5 फीसदी आरक्षण का प्रावधान दिया गया था. ऐसे में सवाल उठते हैं कि आखिर मुस्लिम रिजर्वेशन के पीछे कहानी क्या थी, यह पूरा मामला क्या था और अब कैसे इसे खत्म किया गया है. आखिर इस आरक्षण की जरूरत क्यों पड़ी. सरकार द्वारा मुसलमानों के आरक्षण समाप्त करने के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा तेज हो गई है. वहीं मुस्लिम नेताओं ने सरकार पर जनता को उन आधारों के बारे में गुमराह करने का आरोप लगाया है, जिस आधार पर यह रिजर्वेशन दिया गया था. मुस्लिम कोटा पिछड़ेपन के आधार पर जारी किया गया था. 

 

मुसलमानों की स्थिति पता लगाने के लिए बनाई कमेटी

 

सच्चर कमेटी द्वारा देश में मुसलमानों की स्थिति देखने के बाद, महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में उनकी सामाजिक-शैक्षिक और आर्थिक स्थिति का पता लगाने के लिए रिटायर्ड आईएएस अधिकारी महमूदुर रहमान की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया. अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस चांसलर और बॉम्बे मर्केंटाइल बैंक के पूर्व अध्यक्ष, रहमान और उनकी टीम ने राज्य का दौरा किया. कमेटी ने करीब 5 साल तक इस विषय पर गहन अध्यन किया. कमेटी ने मुसलमानों को नौकरियों, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे कई मापदंडों में पिछड़ा हुआ पाया और 8 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की. जुलाई 2014 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने मराठों को 16 और मुसलमानों को शैक्षणिक संस्थानों के साथ सरकारी व अर्ध-सरकारी नौकरियों में 5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया. महाराष्ट्र में करीब 60 फीसदी मुस्लिम गरीबी रेखा से नीचे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. सरकारी नौकरियों में उनकी सिर्फ 4.4 फीसदी हिस्सेदारी थी और समाज के सिर्फ 2.2 फीसदी लोग ही स्नातक तक पढ़े हुए थे. 

 

आखिर क्यों किया गया समाप्त?

यह अध्यादेश स्थायी कानून में कभी नहीं बदला था. बीजेपी के सत्ता में आने के बाद दिसंबर 2014 में इसे रद्द कर दिया गया था.  2014 का मुस्लिम आरक्षण अध्यादेश इसलिए समाप्त हो गया क्योंकि नई विधानसभा द्वारा इसे निर्धारित संवैधानिक समय सीमा के भीतर विधेयक के रूप में पारित नहीं किया गया था.

 

मुस्लिम नेताओं ने किया 50 उप-जातियों का जिक्र

मुस्लिम नेताओं ने विशेष पिछड़ा श्रेणी-ए (Special Backward Class-SBC-A) के तहत पहचाने गए मुसलमानों के बीच 50 उप-जातियों का जिक्र किया, जिन्हें उनके सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से कोटा दिया गया था. पूर्व मंत्री आरिफ नसीम खान ने इस पर कहा कि मुसलमानों के इन समूहों को आरक्षण उनके सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के की वजह से दिया गया था, न कि इसलिए कि वे मुस्लिम हैं. उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी नेताओं ने यह दावा करके लोगों को गुमराह किया कि यह धार्मिक आधार पर किया गया था. राज्य के राजस्व मंत्री चंद्रकांत बावनकुले ने इस कदम का स्वागत करते हुए बुधवार (18 फरवरी) को कहा था कि कार्रवाई कोर्ट के फैसले के मुताबिक की गई थी. अलग-अलग कोर्ट ने धर्म के आधार पर दिए गए आरक्षण को खारिज कर दिया है.

 

कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने क्या कहा?

आरिफ नसीम खान समेत अन्य मुस्लिम नेताओं का कहना है कि जब आरक्षण को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी, तो कोर्ट ने नवंबर 2014 में नौकरियों में मिलने वाला कोटा स्थगित रखते हुए पढ़ाई में 5 फीसदी मुस्लिम कोटे की इजाजत दे दी थी. वहीं कांग्रेस विधायक अमीन पटेल ने कहा कि पहले सरकार ने आरक्षण पर हमारी सरकार द्वारा पारित अध्यादेश को खत्म होने दिया. फिर उसने हाईकोर्ट के आदेश को लागू नहीं किया, जिसने पढ़ाई में मुसलमानों को 5 फीसदी कोटा बरकरार रखा था. उन्होंने आगे कहा कि अब एसबीसी-ए कैटेगरी के तहत जाति प्रमाण पत्र को अमान्य करने का खाका रद्द कर दिया गया. कांग्रेस नेता ने आगे कहा कि हम मुस्लिम कोटे की बहाली के लिए लड़ते रहेंगे. जस्टिस राजिंदर सच्चर और महमूदुर रहमान की अगुवाई वाली कमेटियों द्वारा मुसलमानों के सुधार के लिए एक कदम के रूप में इसकी जोरदार सिफारिश करने के बाद मुस्लिम आरक्षण दिया गया था. 

 

इस फैसले के बचाव में क्या बोले सामाजिक न्याय मंत्री?

सरकार द्वारा आरक्षण खत्म करने के कदम पर सामाजिक न्याय मंत्री संजय शिरसात ने फैसले का बचाव किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस और एनसीपी ने चुनाव से ठीक पहले वोटरों को खुश करने और अपनी तरफ करने के लिए आरक्षण की घोषणा की थी. उन्होंने आगे कहा कि इसमें जरूरी कानूनी और प्रशासनिक कदम पूरे नहीं किए गए.

 

इस कदम पर क्या बोले विपक्षी दल?

सरकार के इस कदम पर पर कई विपक्षी दलों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है. विपक्ष द्वारा इस फैसले को 'अल्पसंख्यक विरोधी' करार दिया गया है. इस बीच एआईएमआईएम नेता और पूर्व सांसद इम्तियाज जलील ने कहा कि सत्ता पर बैठी हुई पार्टी नहीं चाहती कि मुस्लिम युवा देश में आईएएस और आईपीएस जैसे प्रतिष्ठित पदों पर पहुंचे. साथ ही उन्होंने इस निर्णय की कड़ी आलोचना की है. वहीं एनसीपी शरद पवार के प्रवक्त क्लाइड क्रास्टो द्वारा कहा गया है कि इस फैसले से साफ पता चलता है कि बीजेपी अपने और सहयोगी पार्टियों के मुस्लिम नेताओं को बिल्कुल भी महत्व नहीं देती. उन्होंने आगे कहा कि इससे यह भी जाहिर होता है कि बीजेपी से इन सभी मुस्लिम नेताओं को कभी न्याय नहीं मिलेगा. वहीं इस मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने कहा कि मुसलमानों को वैसे भी रिजर्वेशन का लाभ नहीं मिल रहा था. इसलिए इसकी जमीन पर असर होने की ज्यादा उम्मीद नहीं. उन्होंने आगे कहा कि महायुती सरकार का रुख और उसके विचार इस मुस्लिम आरक्षण के प्रति उसका कड़ा विरोध साफ दिखता है. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ऐसे प्रस्तावों को रद्द कर रही है जो लागू ही नहीं किए जा रहे हैं.


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