सरकारी दफ्तर बने कर्मचारियों के घर !
जन चेतना/विशेष रिपोर्ट : सरकारी कार्यालय आम नागरिकों को समय पर और पारदर्शी तरीके से सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन कई सरकारी दफ्तरों में जिस तरह का नजारा देखने को मिल रहा है, उसने कार्यालयीन अनुशासन और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि कुछ सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों और अधिकारियों के बच्चे तक दिखाई देते हैं, जो कार्यालयीन समय में परिसर में खेलते नजर आते हैं। मामला केवल बच्चों के कार्यालय में मौजूद रहने तक सीमित नहीं है। आरोप है कि कुछ स्थानों पर बच्चे सरकारी कार्यालयों में रखे कंप्यूटर का इस्तेमाल करते हुए गेम खेलते दिखाई देते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ कर्मचारी और अधिकारी अपने कार्यालयीन समय में मोबाइल फोन पर रील देखने, मनोरंजन करने या अन्य व्यक्तिगत गतिविधियों में व्यस्त नजर आते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस समय आम नागरिक अपने जरूरी सरकारी काम के लिए कार्यालय पहुंचते हैं, उस समय उनकी समस्याओं और आवेदनों पर कितना ध्यान दिया जा रहा है?

काम के लिए पहुंचने वाले नागरिकों को करना पड़ता है इंतजार
सरकारी कार्यालयों में आम नागरिक अपने विभिन्न कामों को लेकर पहुंचते हैं। किसी को प्रमाणपत्र बनवाना होता है, किसी को दस्तावेजों से जुड़ा काम होता है तो किसी को सरकारी योजना या प्रशासनिक प्रक्रिया की जानकारी लेने के लिए कार्यालय के चक्कर लगाने पड़ते हैं। लेकिन नागरिकों का आरोप है कि कई बार संबंधित कर्मचारी अपनी सीट पर उपलब्ध नहीं होते या काम को लेकर टालमटोल की जाती है। कुछ मामलों में लोगों को अलग-अलग कारण बताकर वापस भेज दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने काम में देरी को लेकर सवाल करता है तो उसे कथित तौर पर यह तक सुनना पड़ता है कि “काम है तो दिखाई नहीं देता क्या?” ऐसे व्यवहार से सरकारी कार्यालयों में आने वाले आम नागरिकों में नाराजगी पैदा होना स्वाभाविक है। सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा के लिए नियुक्त किए जाते हैं, ऐसे में कार्यालय में आने वाले प्रत्येक नागरिक के साथ सम्मानजनक व्यवहार और समय पर काम करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
पंचायत समिति से लेकर तहसील कार्यालय तक सवाल
इस तरह की शिकायतें केवल किसी एक विभाग या कार्यालय तक सीमित नहीं होने का दावा किया जा रहा है। पंचायत समिति, जिला परिषद, पुलिस स्टेशन, तहसील कार्यालय सहित विभिन्न सरकारी कार्यालयों की कार्यप्रणाली को लेकर समय-समय पर नागरिक सवाल उठाते रहे हैं। सरकारी कार्यालयों में यदि कर्मचारी अपने कार्यालयीन समय में व्यक्तिगत कार्यों में व्यस्त रहते हैं और कार्यालय परिसर में बच्चों के खेलने जैसी गतिविधियां होती हैं, तो निश्चित तौर पर संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी गंभीरता से समीक्षा करनी चाहिए।
सरकारी कंप्यूटर मनोरंजन के लिए या सरकारी काम के लिए?
सरकारी कार्यालयों में लगाए गए कंप्यूटर और अन्य संसाधन जनता के कामकाज के लिए होते हैं। यदि इन संसाधनों का इस्तेमाल कार्यालयीन कार्य के बजाय गेम खेलने या व्यक्तिगत मनोरंजन के लिए किया जा रहा है, तो यह गंभीर प्रशासनिक विषय बन जाता है। सवाल यह भी है कि कार्यालय में मौजूद वरिष्ठ अधिकारी ऐसी गतिविधियों पर नजर क्यों नहीं रखते? क्या कार्यालयों में कर्मचारियों की उपस्थिति, कार्यक्षमता और कंप्यूटर के इस्तेमाल की नियमित निगरानी की जाती है?
रील और मनोरंजन के बीच जनता के काम का क्या?
आज मोबाइल फोन हर व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बन चुका है। लेकिन सरकारी कार्यालय में ड्यूटी के दौरान कर्मचारी यदि लगातार मोबाइल पर रील देखने या अन्य निजी गतिविधियों में व्यस्त दिखाई दें, तो इसका सीधा असर सरकारी कामकाज पर पड़ सकता है। एक ओर आम नागरिक अपने काम के लिए घंटों इंतजार करता है, वहीं दूसरी ओर कर्मचारी कार्यालयीन समय में निजी मनोरंजन में व्यस्त रहें, तो यह व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी जरूरी
सरकारी कार्यालयों में कार्य संस्कृति सुधारने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अचानक निरीक्षण, कर्मचारियों की समय पर उपस्थिति की जांच और कार्यालयीन संसाधनों के उचित इस्तेमाल की निगरानी आवश्यक है। साथ ही नागरिकों की शिकायतों पर भी गंभीरता से कार्रवाई होनी चाहिए। सरकारी कार्यालय किसी कर्मचारी या अधिकारी का निजी स्थान नहीं, बल्कि जनता की सेवा का केंद्र हैं। इसलिए कार्यालयीन समय में अनुशासन बनाए रखना, सरकारी संसाधनों का सही उपयोग करना और आम नागरिकों के काम को प्राथमिकता देना प्रत्येक कर्मचारी की जिम्मेदारी है। अब सवाल यह है कि प्रशासन इस तरह की शिकायतों और आरोपों पर कब गंभीरता से संज्ञान लेगा? क्या सरकारी कार्यालयों में अचानक निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति की जांच की जाएगी? या फिर आम नागरिकों को अपने छोटे-छोटे कामों के लिए इसी तरह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रहना पड़ेगा?






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